
‘अगर मैं शून्य हूं, तो मैं बहुत कुछ हूं’… किसान का बेटा कैसा बना अधिकारी? जानिए सफलता की कहानी
कन्नौज: साधारण किसान परिवार से प्रशासनिक सेवा तक का सफर, कन्नौज जिले में समाज कल्याण अधिकारी के पद पर तैनात वेद प्रकाश मिश्र आज उन युवाओं के लिए एक मिसाल हैं, जो कम समय में बड़ी सफलता पाने की जल्दबाजी में भटक जाते हैं. वेद प्रकाश मिश्र का जीवन यह सिखाता है कि सफलता का रास्ता धैर्य, परिश्रम और सही दिशा से होकर गुजरता है.
उनके पिता सत्य प्रकाश मिश्र एक साधारण किसान परिवार से थे. पढ़ाई में रुचि होने के कारण उन्होंने अधिवक्ता बनने का सपना देखा और कानून की पढ़ाई भी की, लेकिन वकालत में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने खेती और छोटी-मोटी नौकरियों के जरिए परिवार का पालन-पोषण किया.
मऊनाथ भंजन में जन्म और प्रारंभिक शिक्षा
वेद प्रकाश मिश्र का जन्म 1 जनवरी 1989 को पूर्वांचल के मऊनाथ भंजन जिले में हुआ. वे तीन भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटे हैं. उनकी शुरुआती शिक्षा मऊ के विद्या मंदिर से हुई, जहां उन्होंने कक्षा तीन तक पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने एक बौद्ध विद्यालय से आगे की पढ़ाई पूरी की. सीमित संसाधनों के बावजूद परिवार ने शिक्षा को हमेशा प्राथमिकता दी.
आर्थिक संघर्षों के बीच पढ़ाई का जज्बा
एक समय ऐसा भी था, जब परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. वेद प्रकाश मिश्र के पिता जिस विद्यालय में नौकरी करते थे, वहीं वे पढ़ाई करते थे. उस समय स्कूल की फीस मात्र 40 रुपये हुआ करती थी और पिता की सैलरी भी बहुत कम थी. इसके बावजूद उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी. आगे की पढ़ाई के लिए वेद प्रकाश मिश्र इलाहाबाद चले गए, जहां उन्होंने अपने सपनों को साकार करने की नींव रखी.
सिविल सेवा की तैयारी और युवाओं के लिए संदेश
सिविल सेवा की तैयारी के दौरान वेद प्रकाश मिश्र ने कड़ी मेहनत और अनुशासन को अपना मूल मंत्र बनाया. उनका मानना है कि आज का युवा जल्दी सफलता चाहता है और इसी जल्दबाजी में कई बार गलतियां कर बैठता है. वे कहते हैं कि लक्ष्य यह होना चाहिए कि सफलता हासिल की जाए, न कि यह कि कितनी जल्दी हासिल की जाए. पढ़ाई के लिए एक निश्चित नियम, मजबूत विषय पकड़ और निरंतर अभ्यास बेहद जरूरी है.
शून्य से शुरुआत का दर्शन
वेद प्रकाश मिश्र ने अपने जीवन अनुभवों पर आधारित एक कविता-कहानी भी लिखी है, जिसमें उन्होंने कहा, ‘अगर मैं शून्य हूं, तो मैं बहुत कुछ हूं’. उनके अनुसार शून्य को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि शून्य से नीचे कुछ नहीं होता और हर बड़ी शुरुआत शून्य से ही होती है. यही सोच उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है और आज वे हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं.
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